Shrimad Bhagwat Geeta Adhyay 6 in Hindi | भगवत गीता अध्याय 6

Shrimad Bhagwat Geeta Adhyay 6 in Hindi | भगवत गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोग

जय श्री कृष्णा मित्रों! आज हम श्रीमद भगवत गीता का छठवां अध्याय आपके साथ शेयर कर रहे हैं. गीता के अध्याय 6 का नाम आत्मा संयम योग हे. किस अध्याय में हम योग में स्थित मनुष्य के लक्षणों के बारे में बात करेंगे. अगर आप गीता के ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं तो इस आर्टिकल को पूरे ध्यान से पढ़ें और यहां सीखी हुई बातें अपने जीवन में उपयोग करें. ऐसा करने से आपका जीवन अत्यंत सरल और सफल हो जाएगा.

Shrimad Bhagwat Geeta Adhyay 6 in Hindi | भगवत गीता अध्याय 6
Shrimad Bhagwat Geeta Adhyay 6 in Hindi | भगवत गीता अध्याय 6
  • भगवान श्री कृष्ण कहते हैं वह मनुष्य जो बिना किसी फल की इच्छा करे बिना अपना कर्म कर्तव्य समझकर करता जाता है वह सन्यासी के समान है और वह मनुष्य की योगी है. न ही कोई अग्नि को त्याग कर सन्यासी बनता है और न ही कोई कर्मों को त्याग कर योगी बन सकता है.
  • हे पांडु पुत्र अर्जुन तू उसी को योग समझ जिसे सन्यास कहा जाता है, क्योंकि परमात्मा को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को शारीरिक सुख की इच्छा का त्याग करना ही पड़ता है.
  • योग प्राप्त करने के लिए मन को वश में रखने की इच्छा के लिए मनुष्य को कर्म करना होता है. सभी सांसारिक इच्छाओं का अभाव योग को प्राप्त करते करते हो जाता है.
  • कोई भी मनुष्य उस समय योग में स्थित कहलाता है जब वह सभी सांसारिक इच्छाओं तथा शारीरिक सुख का त्याग करके, किसी भी फल की चिंता करे बिना कार्य करता है.
  • मनुष्य को अपने मन की शक्ति से जो जन्म मृत्यु रूपी बंधन है उससे उद्धार पाने का प्रयत्न करना चाहिए, और स्वयं को निम्न योनि में गिरने से बचाना चाहिए, क्योंकि यही मन जीवात्मा का मित्र तो हे ही पर यही जीवात्मा का शत्रु भी है.
  • मनुष्य का मन उसका परम मित्र बन जाता है, यदि मनुष्य अपने मन को अपने वश में कर लेता है. लेकिन यदि मनुष्य अपने उसी मन को वश में ना कर सके तो उसका मन पीयूष का परम शत्रु के सामान हो जाता है.
  • बच्चे को परम शांति स्वरूप पूर्ण रूप से परमात्मा सब प्राप्त होते हैं जब वह अपने मन को वश में कर लेता है. ऐसे मनुष्य के लिए सर्दी हो या गर्मी, सुख हो या दुख, या फिर महान हो या अपना सभी एक समान हो जाता है.
  • ऐसे मनुष्य का चित्त स्थिर होता है और उसकी इंद्रियां वश में करके ज्ञान के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करता है और हमेशा संतुष्ट रहता है. ऐसे ही परमात्मा को प्राप्त कर लेने वाले मनुष्य के लिए मिट्टी, पत्थर, और सोना एक ही समान हो जाता है.
  • परमात्मा को प्राप्त मनुष्य स्वभाव से सभी का हित करता है, मित्रों और शत्रुओं से शुभचिंतकों और ईर्ष्या लोगों से पुण्य आत्माओं और पाप आत्माओं सभी के साथ एक जैसा भाव रखता है.

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